रूसो के शासन संबंधित विचार

रूसों ने राज्य और शासन (सरकार) में स्पष्ट अन्तर किया है। सामाजिक समझौते से जो निकाय बनता. है उसे वह राज्य कहकर पुकारता है। इस सम्प्रभु निकाय की इच्छा को क्रियात्मक रूप देने के लिए सरकार का निर्माण किया जाता है। सरकार का निर्माण सामाजिक समझौते द्वारा नहीं अपितु सम्प्रभुता सम्पन्न समुदाय के प्रत्यादेश द्वारा होता है। अतः सरकार सम्प्रभु का एजेन्ट मात्र होती है जिसे जन समुदाय अपनी इच्छा के अनुसार सीमित, नियन्त्रित और परिवर्तित कर सकता है। रूसो के शब्दों में, “राज्य प्रभुत्व शक्ति सम्पन्न और सर्वोच्च है जबकि सरकार सम्प्रभु राज्य तथा प्रजाजनों के मध्य निर्मित वह संगठन है जो उनके पारस्परिक सम्बन्धों का नियमन करता है, सम्प्रभु द्वारा निर्मित कानून को लागू करता है तथा राजनीतिक और नागरिक स्वतन्त्रता को बनाए रखता है।”


रूसों के अनुसार सरकार का काम केवल शासन करना है, कानून बनाने का कार्य सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न विधायिका का है। सरकार सम्प्रभु जनता की सेवक मात्र है और वह सम्प्रभु द्वारा दी गई शक्तियों का प्रयोग कर सकती है। जनता अपनी इच्छानुसार उसकी शक्ति को मर्यादित या संशोधित कर सकती है या चाहने पर उसे वापस भी ले सकती है।

शासन का वर्गीकरण: रूसो ने चार प्रकार की शासन प्रणालियां मानी है- राजतंत्र, कुलीनतंत्र, प्रजातंत्र और मिश्रित शासन। उसने व्यावहारिक कारणों से लोकतंत्र की आलोचना की है। वह प्रतिनिध्यात्मक लोकतन्त्र का घोर विरोधी था। उसका झुकाव प्रत्यक्ष लोकतन्त्र की ओर है और इसलिए वह प्रतिनिध्यात्मक लोकतन्त्र को सच्चा लोकतन्त्र नहीं मानता। इंग्लैण्ड के सम्बन्ध में उसकी राय थी कि उसकी जनता निर्वाचन के समय ही स्वतन्त्र होती है, शेष अवधि में वह दासता की स्थिति में रहती है। रूसो जनतन्त्र की भी आलोचना करता है क्योंकि उसमें उत्तराधिकार की समस्या बन रहती है। वह कुलीनतन्त्र को श्रेष्ठ शासन प्रणाली मानता है। उसने कुलीनतन्त्र के तीन प्रकार माने हैं। प्राकृतिक, वंशानुगत तथा निर्वाचनात्मक। निर्वाचित कुलीनतन्त्र को वह सर्वोत्तम शासन व्यवस्था कहता है।

माण्टेस्क्यू की भांति रूसो का मत था कि भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां किसी देश की शासन प्रणाली पर गहरा प्रभाव डालती हैं। कृषि प्रधान तथा औद्योगिक देशों की शासन प्रणालियां सर्वथा भिन्न होंगी।

रूसो शासन की सफलता की कसौटी जनसंख्या में वृद्धि मानता है। उसके अनुसार जनसंख्या की वृद्धि राष्ट्र की प्रगति की परिचायक है। वह शासन की शक्तियों की वृद्धि के खिलाफ था। उसकी इस धारणा कि निश्चित अवधि के बाद संविधान पर पुनर्विचार करने के लिए लोकसभाएं बुलाई जाएं, के बाद से संविधान सभाएं बुलाने की प्रथा प्रारम्भ हुई।

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