भारतीय संविधान की विशेषताएं

भारतीय संविधान अपने मूल भावना के संबंध में अद्वितीय है। हालांकि इसके कई तत्व विश्व के विभिन्न संविधानों से उधार लिये गये हैं। भारतीय संविधान के कई ऐसे तत्व हैं, जो उसे अन्य देशों के संविधानों से अलग पहचान प्रदान करते हैं।

भारतीय संविधान की विशेषताएं

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संविधान के वर्तमान रूप में इसकी विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

1. सबसे लंबा लिखित संविधान

संविधान को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है- लिखित, जैसे अमेरिकी संविधान, और अलिखित जैसे-ब्रिटेन का संविधान।
भारत का संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है। यह बहुत बृहद समग्र और विस्तृत दस्तावेज है। मूल रूप से (1949) संविधान में एक प्रस्तावना, 395 अनुच्छेद (22 भागों में विभक्त) और 8 अनुसूचियां थीं। वर्तमान में (2016) इसमें एक प्रस्तावना, 465 अनुच्छेद (25 भागों में विभक्त) और 12 अनुसूचियां हैं। विश्व के किसी अन्य संविधान में इतने अनुच्छेद और अनुसूचियां नहीं हैं।

2. विभिन्न स्रोतों से विहित

भारत के संविधान में अधिकतर उपबंध विश्व के कई देशों के संविधानों और भारत शासन अधिनियम 1935 से लिया गया हैं। संविधान का अधिकांश ढांचागत हिस्सा भारत शासन अधिनियम, 1935 से लिया गया है। संविधान का दार्शनिक भाग (मौलिक अधिकार और राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत) क्रमशः अमेरिका और आयरलैंड से प्रेरित है। भारतीय संविधान के राजनीतिक भाग (संघीय सरकार का सिद्धांत और कार्यपालिका और विधायिका के संबंध) का अधिकांश हिस्सा ब्रिटेन के संविधान से लिया गया है। संविधान के अन्य प्रावधान कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, यूएसएसआर (रूस), फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका, जापान इत्यादि देशों के संविधानों से लिए गए हैं।

3. कठोर और लचीलेपन का सम्मिश्रण

कठोर संविधान उसे माना जाता है, जिसमें संशोधन करने के लिए विशेष प्रक्रिया की आवश्यकता हो। उदाहरण के लिए अमेरिकी संविधान। लचीला संविधान वह कहलाता है, जिसमें संशोधन की प्रक्रिया वही हो, जैसी किसी आम कानूनों के निर्माण की, जैसे- ब्रिटेन का संविधान।

भारत के संविधान मे कठोर और लचीलेपन दोनों के गुण पाये जाते हैं। जहा एक ओर संवैधानिक संशोधन के लिए विशेष बहुत की आवश्यकता होती वही दूसरी ओर सामान्य कानून के लिए साधारण बहुमत की प्रक्रिया अपनाई जाती है।

4. एकात्मकता की ओर झुकाव के साथ संघीय व्यवस्था

भारत का संविधान संघीय सरकार की स्थापना करता है, जिसमें केन्द्र को अधिक शक्तिशाली बनाया गया है। इसमें संघ के सभी आम लक्षण विद्यमान है; जैसे—दो सरकार, शक्तियों का विभाजन, लिखित संविधान, संविधान की सर्वोच्चता, स्वतंत्र न्यायपालिका आदि।

यद्यपि भारतीय संविधान में बड़ी संख्या में एकात्मकता के लक्षण भी विद्यमान हैं, जैसे-एक सशक्त केंद्र, एक संविधान, एकल नागरिकता, एकीकृत न्यायपालिका, आपातकालीन प्रावधान इत्यादि।

5. सरकार का संसदीय रूप

भारतीय संविधान ने अमेरिका की अध्यक्षीय प्रणाली की बजाए ब्रिटेन के संसदीय प्रणाली को अपनाया है। संसदीय व्यवस्था विधायिका और कार्यपालिका के मध्य समन्वय व सहयोग के सिद्धांत पर आधारित है, संसदीय प्रणाली में कार्यपालिक अर्थात् सरकार व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होती है। जबकि अध्यक्षीय प्रणाली दोनों के बीच शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत पर आधारित है। इसमें सरकार व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती।

6. स्वतंत्र न्यायपालिका

भारतीय संविधान एक ऐसी न्यायपालिका की स्थापना करता है, जो कार्यपालिका से स्वतंत्र है। सर्वोच्च न्यायालय नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की गारंटी देता है और संविधान का संरक्षक है। इसलिए संविधान में इसकी स्वतंत्रता के लिए कई प्रावधान किए गए हैं; जैसे-न्यायाधीशों के कार्यकाल की सुरक्षा, न्यायाधीशों के लिए निर्धारित सेवा शर्तें, विधायिका में न्यायाधीशों के कामकाज पर चर्चा पर रोक, सेवानिवृत्ति के बाद अदालत में कामकाज पर रोक, अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति, कार्यपालिका से न्यायपालिका को अलग रखना इत्यादि।

7. मौलिक अधिकार की व्यवस्था

संविधान के तीसरे भाग में छह मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया है। मौलिक अधिकार का उद्देश्य वस्तुतः राजनीतिक लोकतंत्र की भावना को प्रोत्साहन देना है। यह कार्यपालिका और विधायिका के मनमाने कानूनों पर निरोधक की तरह काम करते हैं। उल्लंघन की स्थिति में इन्हें न्यायालय के माध्यम से लागू किया जा सकता है। जिस व्यक्ति के मौलिक अधिकार का हनन हुआ है, वह सीधे सर्वोच्च न्यायालय की शरण में जा सकता है।

8. राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत

राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत भारतीय संविधान की अनूठी विशेषता है। इनका उल्लेख संविधान के चौथे भाग में किया गया है। नीति-निदेशक तत्वों का कार्य सामाजिक व आर्थिक लोकतंत्र को बढ़ावा देना है। इनका उद्देश्य भारत में एक ‘कल्याणकारी राज्य’ की स्थापना करना है। संविधान में कहा गया है कि देश की शासन व्यवस्था में ये सिद्धांत मौलिक हैं और यह देश की जिम्मेदारी है कि वह कानून बनाते समय इन सिद्धांतों को अपनाए। हालांकि ये मौलिक अधिकारों की भांति बाध्यकारी नहीं है।

9. मौलिक कर्तव्य

मूल संविधान में मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख नहीं किया गया है। इन्हें 42वें संविधान संशोधन 1976 के माध्यम से से जोड़ा गया था। मौलिक कर्तव्य नागरिकों को यह याद दिलाते हैं कि अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते समय उन्हें याद रखना चाहिए कि उन्हें अपने समाज, देश व अन्य नागरिकों के प्रति कुछ जिम्मेदारियों का निर्वाह भी करना है। नीति-निदेशक तत्वों की तरह मौलिक कर्तव्यों को भी बाध्यकारी रूप में लागू नहीं किया जा सकता।

10. आपातकालीन प्रावधान

आपातकाल की स्थिति से प्रभावशाली ढंग से निपटने के लिए भारतीय संविधान में राष्ट्रपति के लिए बृहद आपातकालीन प्रावधानों की व्यवस्था है। इन प्रावधानों को संविधान में शामिल करने का उद्देश्य है देश की संप्रभुता, एकता, अखण्डता और सुरक्षा, संविधान एवं देश के लोकतांत्रिक ढांचे को सुरक्षा प्रदान करना। संविधान में तीन प्रकार के आपातकाल की विवेचना की गई है:

1. राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद-352)
2. राज्य में आपातकाल (अनुच्छेद 356)
3. वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360)।

आपातकाल के दौरान देश की पूरी सत्ता केंद्र सरकार के हाथों में आ जाती है और राज्य केंद्र के नियंत्रण में चले जाते हैं।

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