नियंत्रण और संतुलन का सिद्धान्त

नियंत्रण और संतुलन का सिद्धान्त शक्ति पृथक्करण सिद्धांत का एक उप सिद्धान्त है। यह इस मान्यता पर आधारित है कि पूर्ण शक्ति पृथक्करण शासन संचालन के कार्य को असम्भव बना देता है। अतः शासन में संतुलन बनाये रखने के लिए ऐसे सिद्धान्त की आवश्यकता है जो शासन के अंगों की स्वेच्छाचारिता और शक्ति के दुरुपयोग को रोक सके और उनमें संतुलन बनाये रख सके। नियंत्रण और संतुलन का सिद्धान्त शासन के प्रत्येक अंग को दूसरे अंगों की शक्तियों में साझेदार बनाता है, शक्ति के प्रयोग को सीमित एवं नियन्त्रित करता है, शक्ति के दुरुपयोग एवं शासन के अंगों की स्वेच्छाचारिता को रोकता है तथा शासन में संतुलन बनाये रखने का काम करता है।

नियंत्रण और संतुलन का सिद्धान्त उतना ही प्राचीन है जितना कि पोलिवियस और सिसरो। रोमन गणराज्य की श्रेष्ठता नियंत्रण और संतुलन के सिद्धांत में थी। माण्टेस्क्यू और ब्लैकस्टोन के सिद्धान्तों में यह सिद्धान्त निहित है। वर्तमान समय में यह ‘सीमित शासन’ की धारणा में निहित है। जहाँ कहीं शासन सीमित शक्तियों का उपयोग करता है, वहां नियंत्रण और संतुलन का सिद्धान्त विद्यमान है। आज की प्रतिनिधि संस्थाओं पर लिखित एवं अलिखित संविधान की सीमाएँ होती हैं। जहाँ द्वि-सदनात्मक प्रणाली है, वहाँ दोनों सदन एक दूसरे को सन्तुलित करते हैं। स्वतन्त्र न्यायपालिका शासन में संतुलन स्थापित करने में सहायक है। प्रबुद्ध जनमत और जागरूक एवं साहसी नागरिक एवं स्वतन्त्र प्रेस स्वयं में एक व्यापक संतुलन है। अमेरिकी संविधान में भी शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त को नियंत्रण और संतुलन के सिद्धान्त के साथ स्वीकार किया गया है। नियंत्रण और संतुलन सिद्धान्त के प्रमुख उदाहरण निम्न हैं:

1. अमरीकी संविधान सारी विधायी शक्ति कांग्रेस को प्रदान करता है। परन्तु कांग्रेस द्वारा निर्मित विधियों पर राष्ट्रपति की स्वीकृति अनिवार्य है। राष्ट्रपति विधेयकों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है। उसके पास “जेवी” और “निलम्बित” दो प्रकार के निषेधाधिकार हैं। परन्तु यदि कांग्रेस राष्ट्रपति द्वारा अस्वीकृत किसी विधेयक को पुन: दो तिहाई बहुमत से पारित कर देती है, तो फिर वही विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के बिना ही कानून बन जाता है।

2. अमेरिकी संविधान सारी कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति को प्रदान करता है, परन्तु महत्त्वपूर्ण पदों पर राष्ट्रपति द्वारा की गई नियुक्तियों और दूसरे देशों से की गयी सन्धियों पर सीनेट के अनुसमर्थन की आवश्यकता होती है।

3. राष्ट्रपति सेनाओं का सर्वोच्च कमाण्डर है, परन्तु उसके पास युद्ध की घोषणा करने का अधिकार नहीं। यह अधिकार कांग्रेस का है। यद्यपि राष्ट्रपति ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है जहाँ युद्ध करना अनिवार्य हो जाये।

4. संविधान अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय को कार्यपालिका और कांग्रेस से स्वतन्त्र बनाता है। न्यायाधीशों की नियुक्तियाँ सीनेट के अनुसमर्थन पर राष्ट्रपति करता है और कांग्रेस न्यायाधीशों के वेतन तथा न्यायालय के खर्चे निर्धारित करती है। कांग्रेस राष्ट्रपति सहित न्यायाधीशों पर महाभियोग लगा सकती है। दूसरी ओर, न्यायपालिका कार्यपालिका आज्ञप्तियों(order) और कांग्रेस के कानूनों को अवैध घोषित कर सकती है अर्थात् उसे न्यायिक पुनरावलोकन का अधिकार है।

5. कांग्रेस के दोनों सदन एक-दूसरे को सन्तुलित करते हैं। प्रतिनिधि सभा द्वारा पारित वित्तीय विधेयकों में सीनेट शीर्षक को छोड़कर गम्भीर परिवर्तन कर सकती है। सीनेट प्रतिनिधि सदन द्वारा लगाये गये महाभियोग के आरोपों की जाँच करती है। ब्रिटेन में, जहाँ शक्तियों का औपचारिक पृथक्करण नहीं किया गया है वहाँ भी नियंत्रण और संतुलन का सिद्धान्त न्यूनाधिक मात्रा में विद्यमान है। जैसा कि कोरी और ग्राहम ने कहा है कि “यद्यपि ब्रिटेन में शक्तियों का औपचारिक पृथक्करण नहीं है तथापि यह कहना गलत होगा कि शासन के अंग एक-दूसरे पर कोई अंकुश नहीं रखते। लोकसेवा के पदाधिकारी कभी-कभी उन कार्यों को करने में कठिनाई अनुभव करते हैं जो संसद उनसे कराना चाहती है। न्यायालय भी अक्सर कानून की ऐसी व्याख्या करते हैं जो संसद के इरादों और कार्यपालिका की इच्छाओं या आशाओं से भिन्न होते हैं। कभी-कभी (दलीय) बहुमत भी संसद में मन्त्रियों को समर्थन देने में उदासीन रहता है। महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि यदि संसद वास्तव में कोई निश्चय कर ले तो उसके मार्ग को कोई अवरुद्ध नहीं कर सकता |”

Leave a Comment

Your email address will not be published.