हाॅब्स का सामाजिक समझौता सिद्धांत

 

थॉमस  हाब्स  का  जन्म  वेस्टपोर्ट  (इंग्लैंड)  में  1588  में  हुआ  था।  उसके  जीवन  में  घटित  होने वाली  घटनाओं  का  प्रभाव  उस  पर  सबसे  अधिक  पड़ा।  जब  वह  छोटा  था  तभी  से  इंग्लैंड  में  गृह  युद्ध  प्रारंभ  हो  चुके  थे।  उस  पर  सबसे  अधिक  प्रभाव  इंग्लैंड  के  युद्ध  का  ही  पड़ा।  उसने 1651  में  लेवायथन  नामक  पुस्तक  की  रचना  की।  जिसमें  उसने  सामाजिक  समझौता  सिद्धांत का  वर्णन  किया।  उस  समय  इंग्लैंड  में  राजा  और  संसद  के  बीच  संघर्ष  हो  रहे  थे।  जिसके  कारण  उस  समय  अराजकता  फैली  हुई  थी।  इन  सब कारणों  ने  उसके  समक्ष  मनुष्य  का  घृणित  पक्ष  रखा।

 

मानव स्वभाव – हाब्स सबसे अधिक अपने जीवन में घटित घटनाओं से प्रेरित हुआ । उस समय इंग्लैंड में गृह युद्ध हो रहा था , जिसने हाब्स के मस्तिष्क पर व्यापक प्रभाव डाला ।  अतः हाब्स ने अपने मानव स्वभाव के अंतर्गत मनुष्य को स्वार्थी , अहंकारी एवं क्रोधी , हिंसक बताया।  उसका मानना था कि मनुष्य स्वभाव से ही बुरा होता है। वह अपने बचाव में कुछ भी करने को तैयार हो जाता है, चाहे वह नैतिकता के अनुरूप हो या उसके खिलाफ। जब किसी अन्य के माध्यम से मनुष्य का फायदा होता है तब वह अन्य लोगों के साथ रहना पसंद करता है लेकिन जब उसका फायदा नहीं होता है तब वह अन्य लोगों का साथ छोड़ देता है। हाब्स ने मनुष्य को हिंसक भी कहा है। उसका मानना था कि मनुष्य स्वयं स्वभाव से ही हिंसक एवं युद्ध विनाशी रहा है। उसे जब भी ऐसा करने का अवसर मिलता है, तो वह इसका गलत लाभ लेने से नहीं चूकता। इस प्रकार हाब्स मनुष्य के बुरे स्वभाव का वर्णन करता है।

 

प्राकृतिक अवस्था- हाब्स के अनुसार प्राकृतिक अवस्था में केवल व्यक्ति को दो ही अधिकार प्राप्त है –पहला  , अपने जीवन की रक्षा का अधिकार , दूसरा- अपनी जीवन की रक्षा के लिए कुछ भी करने का अधिकार।  इस अवस्था में व्यक्ति अपनी जीवन की रक्षा के नाम पर किसी भी अन्य व्यक्ति की हत्या कर सकता है तथा अपने जीवन को बढ़ाने के लिए अन्य लोगों की संपत्ति को भी हड़प सकता है।  मानव स्वभाव से ही बुरा होने के कारण वह अन्य व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने से जरा भी नहीं हिचकिचाता है। हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से लडने लगता है तथा आपस में परस्पर विश्वास नहीं करता है।  इस अवस्था में जीवन की कोई कीमत नहीं है , कोई भी किसी को समाप्त कर सकता है।  यह अवस्था “शक्ति ही सत्य है”  पर आधारित है।  अन्य शब्दों में कहें कि यह अवस्था एक जंगल राज है तो यह गलत नहीं होगा। हाब्स के अनुसार इस अवस्था में कुछ विवेकशील लोग भी होंगे जो शांतिप्रिय होंगे।

 

 समझौते का कारण-  जैसा कि हाब्स ने बताया प्राकृतिक अवस्था की स्थिति शक्ति ही सत्य है पर आधारित थी।  अतः इससे लोगों को हमेशा अपनी जान एवं संपत्ति के छिन जाने की चिंता रहती थी।   अतः लोगों ने सामूहिक तौर पर मिल जुलकर एक राजनीतिक समुदाय अर्थात राज्य को बनाने का निर्णय किया।  ताकि लोग अपनी जान एवं सामान को सुरक्षित कर सकें , तथा राज्य उनकी रक्षा करें।

 

समझौता-  प्राकृतिक अवस्था में जीवन अत्यंत कठोर होने के कारण लोगों ने इस अवस्था को त्यागने का फैसला किया।  इस प्राकृतिक अवस्था में जीवन का कोई उद्देश्य नहीं था।  सिर्फ एक एक दिन जीवन को जीना ही एकमात्र कार्य था।  इस अवस्था को छोड़ते हुए लोगों ने एक नए संस्था की स्थापना का निर्णय किया।  इसके अंतर्गत उन्होंने एक समझौता किया जिसमें  “हर व्यक्ति परस्पर दूसरे व्यक्ति से कहता है कि मैं अपने अधिकार एवं शक्ति इस सभा अथवा राज्य को सौंपता हूं, ताकि यह हम पर शासन करें एवं हमारे जीवन की रक्षा करें और इसी प्रकार अन्य व्यक्ति भी अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों का निषेध इसी मात्रा में करें।  इस प्रकार लोगों के द्वारा किए गए इस समझौते को थॉमस हॉब्स सामाजिक समझौते के नाम से पुकारता है।

 

नवीन राज्य का उदय-  हाब्स  पुराने अवस्था को त्यागने के बाद एक नवीन राज्य की कल्पना करते हैं।  जिसमें शासन अब राज्य द्वारा होगा तथा इस अवस्था में लोगों के जीवन की गारंटी होगी।  इस अवस्था में प्राकृतिक अवस्था के समान अराजकता एवं जंगलराज नहीं होगा ,  बल्कि सभी लोग कुछ निश्चित नियमों से बंधे होंगे।  हाब्स  ने इन लोगों का अधिकार लेवायथन नामक एक दैत्य अथवा महामानव को दिया है   जो सर्वशक्तिमान है।  देखने से पता चलता है कि यह एक संप्रभु राज्य अथवा सभा है जिससे कोई भी चुनौती नहीं दे सकता।  हाब्स के अनुसार इस राज्य का प्रथम उद्देश्य लोगों के जीवन एवं संपत्ति की रक्षा करना है।  इस राज्य के शासक अथवा लेवायथन नामक शासक को सभी प्रकार के अधिकार प्राप्त हैं।  यहां तक कि व्यक्ति भी इस शासक का विरोध नहीं कर सकता है।  क्योंकि यदि व्यक्ति इसका विरोध करता है तो इसका तात्पर्य यही होगा कि व्यक्ति  खुद के द्वारा बनाए गए समझौते का विरोध कर रहा है। यदि यह समझौता अर्थात लेवायथन नष्ट होता है ,  तो मनुष्य पुनः प्राकृतिक अवस्था में पहुंच जाएगा।  इसलिए हाब्स  किसी व्यक्ति को भी लेवायथन का विरोध करने का अधिकार नहीं देता है ।  इस शासक के सर्व संपन्नता एवं निरंकुशता से पता चलता है कि हाब्स द्वारा निर्मित यह राज्य एक राजतंत्रात्मक राज्य है।

 

हाॅब्स के सामाजिक समझौता सिद्धांत की विशेषताएं:

1) इसकी पहली विशेषता यह है कि समझौता सामाजिक है शासकीय नहीं। शासकीय समझौते में शासक और शासितों में समझौता होता है, किंतु हाॅब्स का समझौता राजा और प्रजा के मध्य नहीं है, बल्कि विभिन्न व्यक्तियों के बीच हुआ है। समझौता करने वाले पक्ष व्यक्ति हैं, जो आपस में एक दूसरे के साथ समझौता करके संप्रभु (शासक) की सृष्टि करते हैं। अतः समझौते का शर्त शासक पर लागू नहीं होता।

2) शासक समझौते में किसी भी पक्ष के रुप में सम्मिलित नहीं है, अतः वह जो कुछ भी करता है उसके लिए वह किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं होता तथा वह पूर्णतः निरंकुश होता है।

3) जिन उद्देश्यों से समझौते की रचना हुई है वे समझौते के अंग माने दिए गए हैं। इसका अर्थ यह है कि जब तक उनकी पूर्ति होती रहेगी, तब तक समझौता जारी रहेगा।

4) यह मनुष्य के भय पर आधारित है। हिंसा से उत्पन्न मृत्यु का भय ही मनुष्य को यह समझौता करने के लिए बाध्य करता है।

5) शासक सर्वोच्च विधायक होता है। उसके आदेश ही नियम अथवा विधि होते हैं।

6) प्राकृतिक अवस्था में एकाकी रहने वाले व्यक्तियों ने इस समझौते के माध्यम से समाज का निर्माण किया है, अतः यह सामाजिक समझौता है।

7) प्रजा द्वारा किसी भी कारण से किया जाने वाला आज्ञाभंग अन्यायपूर्ण है, क्योंकि वह अपनी व्यक्तिगत इच्छा को प्रभु की इच्छा में विलीन कर देने वाले उपयुक्त समझौते के प्रतिकूल है।

8) समझौते द्वारा विभिन्न संघर्षरत इच्छाओं का स्थान एक प्रतिनिध्यात्मक इच्छा ग्रहण कर लेती है। इस प्रकार शासक के हाथ में एक सामूहिक सत्ता आ जाती है। वह एक कृत्रिम व्यक्ति है। क्योंकि वह समझौता करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारों को प्राप्त कर लेता है, अतः वह प्रत्येक व्यक्ति का प्रतिनिधि है।

 

संक्षेप में पढ़ें : हाॅब्स का सामाजिक समझौता सिद्धांत

 

हाॅब्स के सामाजिक समझौता सिद्धांत की आलोचना:

आलोचकों ने हाॅब्स के सामाजिक समझौता सिद्धांत का कड़ा विरोध किया है। निम्नलिखित तर्क के आधार पर हाॅब्स के सिद्धांत की आलोचना की जाती है –

1) मानव स्वभाव का दोषपूर्ण चित्रण : हाॅब्स ने मनुष्य स्वभाव का दोषपूर्ण, एकाकी और निराशावादी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। वह मनुष्य को घोर स्वार्थी, कपटी और क्रूर बतलाता है, जबकि सहानुभूति, उदारता, दयालुता, परोपकार और प्रेम आदि मानवीय गुण भी उस में पाए जाते हैं। हाॅब्स इन्हें सर्वथा भुला देता है, वह केवल उसकी पाशविक प्रवृत्तियों पर ही बल देता है। ऐसे एकपक्षीय दृष्टिकोण के आधार पर राजनीतिक सिद्धांतों का निर्माण नहीं हो सकता।

2) प्राकृतिक अवस्था अस्वाभाविक : हाॅब्स की प्राकृतिक अवस्था असत्य, अस्वाभाविक और अनऐतिहासिक है। प्राकृतिक दशा में मनुष्य एकाकी और ऐसी दशा में रहता था, जिसमें हत्या, हिंसा, छल-कपट का साम्राज्य था, किंतु समझौता होने के बाद वह सामाजिक बनकर शांतिपूर्ण समाज में रहने लगा। उसकी प्रवृत्ति में इस प्रकार एकाएक परिवर्तन कैसे आ गया कि उसने अराजकता और अव्यवस्था को शुभ सुव्यवस्था में परिवर्तित कर लिया। एक ही क्षण में प्राकृतिक अवस्था में रहने वाले मनुष्य ने संघर्षपूर्ण जीवन को छोड़कर सहयोगी जीवन की पद्धति को कैसे अपना लिया।

3) प्राकृतिक दशा में प्राकृतिक अधिकारों की मान्यता असंगत है : प्राकृतिक दशा का वर्णन करते हुए हाॅब्स ने यह भी प्रतिपादित किया है कि उसमें व्यक्ति को कुछ अधिकार भी प्राप्त होते हैं जिनका रूप प्राकृतिक होता है। अराजकतापूर्ण प्राकृतिक अवस्था में व्यक्ति का कोई अधिकार हो सकता है यह कहा जाना अतार्किक है।

4) अतार्किक : हाॅब्स की यह भ्रमपूर्ण धारणा है कि आदिम समाज में मनुष्य एकाकी रहता है। हाॅब्स को यह ज्ञात नहीं था कि मनुष्य में सामाजिक जीवन के तत्वों का कभी अभाव नहीं रहा। ऐतिहासिक तथ्य यह है कि व्यक्ति कभी इस प्रकार अकेले नहीं रहे, वह किसी न किसी प्रकार के समाज में रहते आए हैं।

5) निरंकुशता का समर्थन : हाॅब्स द्वारा स्थापित शासन पर किसी प्रकार का कोई नियंत्रण नहीं है और यह पूरी तरह से निरंकुश है। उस पर न तो कानून का अंकुश है और न व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का ही कोई अंकुश है। वस्तुतः हाॅब्स ने अपने समझौता सिद्धांत द्वारा मनुष्य को सर्वथा अधिकार शून्य करके लेवायाथन की दासता में जकड़ दिया है। इसमें मनुष्यों की स्थिति लेवायाथन रूपी चरवाहे के द्वारा हांके जाने वाले पशुओं के झुंड जैसी लगती हैं।

 

महत्त्व :

यद्यपि हाॅब्स के सामाजिक समझौता सिद्धांत की घोर आलोचना की गयी है, किंतु फिर भी इस सिद्धांत का अपना एक महत्व है। हाॅब्स ने सामाजिक समझौते के सिद्धांत को प्रतिपादित कर इस सत्य का प्रतिपादन किया है कि राज्य न तो ईश्वर द्वारा उत्पन्न दैवीय संस्था है और न किसी प्राकृतिक विकास का परिणाम, वरन् यह तो मानव निर्मित एक ऐसी प्रथम संस्था है, जिसे व्यक्ति द्वारा अपनी कुछ निश्चित आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए निर्मित किया गया है। अतः इस उद्देश्य को प्राप्त करने का राज्य एक साधन मात्र है स्वयं में साध्य नहीं। हाॅब्स के चिंतन को वैज्ञानिक माना जाता है, क्योंकि उसने मानव स्वभाव का यथार्थ चित्रण किया है। मानव स्वभाव के विश्लेषण पर ही उसने अपने सिद्धांत को ढाला है।

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